एक स्त्री हूँ मैं ....।।।
अपराध मेरा केवल इतना है ....
कि ... स्त्री हूँ मैं ....।।।
जीवन में हर पीड़ा को सहती ....
एक ऐसी जीवनी हूँ मैं ....।।।
कभी बेटी .... तो कभी बहन हूँ मैं ....
कभी पत्नी .... तो कभी माँ हूँ मैं ....।।।
हर रूप में तुझको सार्थक करती ....
वो स्त्री चरित्र हूँ मैं ....।।।
जन्म से पहले कहीं .. जन्म के बाद कहीं ....
प्राण जिसके लेते हो ... वहीं संतान हूँ मैं ....।।।
मेरे जीवन को व्यर्थ समझने वालो ....
तुमसे भी बेहतर करने में सक्षम हूँ मैं ....।।।
वासना पूर्ति की कोई यंत्र नहीं ....
तेरी ही तरह एक मनुष्य शरीर हूँ मैं ....।।।
तुझ जैसों को भी जन्म देती ....
ऐसी अभागन स्त्री हूँ मैं ....।।।
ना खुल कर जीने का अधिकार है मुझे ....
बंधनों के संसार में जीती हूँ मैं ....।।।
अपने ही अधिकार पाने के लिए लडती रहूँ ....
ऐसी असहाय स्त्री हूँ मैं ....।।।
अस्तित्व तेरे जीवन को देती है जो ....
वहीं स्त्री रूप हूँ मैं ....।।।
फ़िर मेरे ही अस्तित्व पर देते मुझे शर्म ....
क्या इस काबिल हूँ मैं ....???
जन्म से मृत्यु तक हर क्षण तेरे साथ ....
अलग-अलग किरदार निभाती हूँ मैं ....।।।
फिर अपने ही स्वाभिमान की हर क्षण ....
क्यों बलि चढ़ाती हूँ मैं ....???
शक्ति-सामर्थ्य जो तुझको देती है ....
वहीं स्त्री-शक्ति हूँ मैं ....।।।।
फिर यह कैसा घमंड तुझे अपनी मर्दानगी पर ....???
क्योंकी तेरी ही शक्ति का तो केंद्र हूँ मैं ....।।।
क्यों अपने अधिकार के लिए लड़ती रहूँ ....
जबकि उन सब की हक़दार हूँ मैं ....।।।
हम दोनों सिक्के के पहलू की तरह हैं ....
एक ओर तेरा .... तो दूसरी ओर हूँ मैं ....।।।
ना कभी .... तू सर्वोपरी रहा है ....
ना ही कभी .... सर्वोपरि रही हूँ मैं ....।।।
जो आदर मैंने तुझे दिया है ....
उसी आदर की आशा तुझसे करती हूँ मैं ....।।।
ना अपराध बोध हो मुझे , अपने जीवन पर ....
ऐसा कुछ तुम करो .... यहीं इच्छा रखती हूँ मैं ....।।।
मुझको भी तुम मनुष्य समझो ....
यहीं याचना हर क्षण करती .... एक स्त्री हूँ मैं ....।।।
