क्या आरज़ू है तेरी .........
क्या आरज़ू है तेरी ये तो बता ,
क्यूँ इस जन्नत को तू कर रहा है तबाह ....
क्या अश्को में नहीं डूबा होगा खुदा का वो घर ,
जो तू तबाह कर रहा है उसका ही ये घर ....
शायद तू नहीं शामिल उसके बन्दों में ,
क्योंकि तू ही है कातिल उसके बन्दों का ....
याद रख खुदा का है फरमान ,
गर है तू इन्सां तो बन इन्सां ....
गर है तू इन्सां तो ना बन शैतां ....।।।।।।
खुद को तू रोक ले ,
और ज़ख्म ना तू सबको दे ....
दहशत की इस ज़िन्दगी से ,
ज़रा सुकूं तू सबको दे ....आँखों के हर आँसू अभी गीले है ,
दिल के हर ज़ख्म भी अभी जिंदा है ....
अब हम नहीं काबिल कुछ और सहने के ,
बस खुद को तू रोक ले वार करने से ....
शायद तू नहीं शामिल खुदा के बन्दों में ,
क्योंकि तू ही है कातिल उसके बन्दों का ....
याद रख खुदा का है फरमान ,
गर है तू इन्सां तो बन इन्सां ....
गर है तू इन्सां तो ना बन शैतां ....।।।।।।
क्या आरज़ू है तेरी ये तो बता ,
क्यूँ इस जन्नत को तू कर रहा है तबाह ....।।।।।
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