Sunday, December 23, 2012

क्या आरज़ू है तेरी .........


क्या आरज़ू है तेरी ये तो बता ,
क्यूँ इस जन्नत को तू कर रहा है तबाह .... 
क्या अश्को में नहीं डूबा होगा खुदा का वो घर , 
जो तू तबाह कर रहा है उसका ही ये घर ....

शायद तू नहीं शामिल उसके बन्दों में ,
क्योंकि तू ही है कातिल उसके बन्दों का ....
याद रख खुदा का है फरमान ,
गर है तू इन्सां तो बन इन्सां ....
गर है तू इन्सां तो ना बन  शैतां  ....।।।।।।


खुद को तू रोक ले ,
और ज़ख्म ना तू सबको दे ....
दहशत की इस ज़िन्दगी से ,
ज़रा सुकूं तू सबको दे ....
आँखों के हर आँसू अभी गीले  है  ,
दिल के हर ज़ख्म भी अभी जिंदा है ....
अब हम नहीं काबिल कुछ और सहने के ,
बस खुद को तू रोक ले वार करने से ....

शायद तू नहीं शामिल खुदा के  बन्दों में ,
क्योंकि तू ही है कातिल उसके बन्दों का ....
याद रख खुदा का है फरमान ,
गर है तू इन्सां तो बन इन्सां ....
गर है तू इन्सां तो ना बन  शैतां  ....।।।।।।

क्या आरज़ू है तेरी ये तो बता ,
क्यूँ इस जन्नत को तू कर रहा है तबाह ....।।।।।






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