Thursday, April 11, 2013



कुछ अपने से लगने लगे थे ...


कुछ अपने से लगने लगे थे ...
कुछ तुम से जुड़ने लगे थे ...
कुछ करीब से होने लगे थे ...
कुछ मोहब्बत सी करने लगे थे ...।।

इश्क का ख़ुमार कुछ इस तरह चढ़ गया था ...
हर अपने बेगाने और सब बेगाने अपने लगने लगे थे ...
ना दिन की खबर , ना रातों का पता था ...
हर ख्व़ाब तेरे बिना तब अधूरे से लगने लगे थे ...।।

कुछ ऐसा था वो एहसास ...
जो न कभी हम बयान कर सकते थे ...
कुछ ऐसा था वो पल ...
जो ना फिर कभी जी सकते थे ...।।

मेरे एहसास को न तुम कभी समझ पाये ...
लफ्ज़-ऐ-जुबान  कैसे कहते , 
तुम तो मेरी आँखें भी पढ़ ना पाये ...
इजहार-ऐ-मोहब्बत क्या करते , 
तुम तो हमसे अलविदा तक कह ना पाये ...।।

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